राष्ट्र संवाद टाइम्स : ajay verma
गरीबी से निकलीं, हुनर से चमकीं— दिलकश जहाँ बनीं ‘लखपति दीदी’, अब देशभर में बज रहा नाम
स्वयं सहायता समूह से जुड़कर बदली जिंदगी की तस्वीर, हाथों से तैयार आर्टिफिशियल ज्वैलरी ने दिलाई नई पहचान; प्रधानमंत्री के मंच संचालन तक पहुंचीं
हापुड़। कभी गरीबी और भविष्य की चिंता से परेशान रहने वाली एक युवती ने हालात के आगे घुटने टेकने के बजाय अपने हुनर को हथियार बनाया और आज अपनी मेहनत के दम पर न सिर्फ परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत कर रही हैं, बल्कि देशभर में अपनी पहचान बना रही हैं। यह कहानी है ग्राम पंचायत सलाई की रहने वाली 28 वर्षीय दिलकश जहाँ पुत्री फुरकत अली की, जिन्होंने राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत स्वयं सहायता समूह से जुड़कर अपनी जिंदगी की दिशा ही बदल दी।
एमए और एलएलबी तक शिक्षित दिलकश जहाँ समूह से जुड़ने से पहले विद्यार्थी थीं। आर्थिक परिस्थितियों को लेकर वह अक्सर चिंतित रहती थीं। उनके मन में यह सवाल रहता था कि गरीबी से बाहर निकलकर परिवार का सहारा कैसे बनें और समाज में सम्मान के साथ अपनी अलग पहचान कैसे कायम करें। इसी तलाश के बीच राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन उनके जीवन में उम्मीद की किरण बनकर आया।बैठक में सुनी योजना, फिर बदलती चली गई जिंदगी गांव में आईसीआरपी दीदियों के साथ ब्लॉक से पहुंचे ब्लॉक मिशन प्रबंधक मनीष कुमार और वीरेंद्र कुमार ने महिलाओं को स्वयं सहायता समूहों और सरकार की योजनाओं की जानकारी दी। दिलकश जहाँ ने उनकी बातों को गंभीरता से सुना और ‘खुशी स्वयं सहायता समूह’ से जुड़ने का फैसला किया। इसके बाद वह लगातार समूह, ग्राम संगठन और सीएलएफ की बैठकों में शामिल होने लगीं।समूह से जुड़ने के बाद उनके भीतर आत्मविश्वास बढ़ा। अन्य महिलाओं के साथ मिलकर काम करने से उन्हें यह एहसास हुआ कि आर्थिक मजबूती के साथ सामाजिक सम्मान और आत्मनिर्भरता भी हासिल की जा सकती है।
एक लाख रुपये से शुरू किया काम, अब लाखों में पहुंची आमदनी दिलकश जहाँ ने स्वयं सहायता समूह से एक लाख रुपये की धनराशि लेकर हाथ से तैयार होने वाली आर्टिफिशियल ज्वैलरी का काम शुरू किया। उनके समूह में 11 सदस्य हैं, जो मिलकर आकर्षक हैंडमेड आर्टिफिशियल ज्वैलरी तैयार करती हैं।समूह द्वारा तैयार उत्पादों को सिर्फ स्थानीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि जिले और दूसरे प्रदेशों में आयोजित होने वाले सरस मेलों में भी स्टॉल लगाकर बेचा जाता है। इस कारोबार से समूह को प्रतिवर्ष करीब तीन से चार लाख रुपये तक की आमदनी हो रही है।
वहीं परिवार की वार्षिक आय भी करीब चार से पांच लाख रुपये तक पहुंच गई है।जिस मंच का सपना भी नहीं देखा, वहां मिली बड़ी जिम्मेदारी दिलकश जहाँ की सफलता की कहानी यहीं खत्म नहीं होती।
11 मार्च 2024 को दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मंच का संचालन करने का अवसर मिलना उनके लिए जिंदगी का सबसे यादगार पल बन गया। वह बताती हैं कि उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि वह प्रधानमंत्री के मंच का संचालन करेंगी।आज स्वयं सहायता समूह ने उन्हें सिर्फ आर्थिक मजबूती ही नहीं दी, बल्कि जिले से लेकर देशभर में पहचान और सम्मान भी दिलाया है।दिलकश जहाँ ‘खुशी स्वयं सहायता समूह’ से जुड़ी हैं, जो गरिमा महिला प्रेरणा संकुल समिति, जसरूपनगर के अंतर्गत कार्य कर रहा है। उनका कहना है कि राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन ने उन्हें आगे बढ़ने का अवसर दिया।
वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मिशन और अधिकारियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहती हैं कि स्वयं सहायता समूहों ने ग्रामीण महिलाओं को कमजोरी से आत्मनिर्भरता, चिंता से आत्मविश्वास और गुमनामी से सम्मान की पहचान तक पहुंचाने का काम किया है।
