राष्ट्र संवाद टाइम्स : ajay verma :
उम्र बढ़ी है, जिंदगी नहीं थमी; अब बुजुर्गों को सहारे नहीं, सम्मान और अपने हिस्से का आसमान चाहिए
हापुड़/पिलखवा। उम्र का बढ़ना जिंदगी के सफर का आखिरी पड़ाव नहीं, बल्कि अनुभवों से समृद्ध वह दौर है, जहां इंसान के पास कहने के लिए सबसे ज्यादा कहानियां और देने के लिए सबसे ज्यादा सीख होती है। एक अक्टूबर को मनाया जाने वाला अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस इसी सच्चाई को सामने लाता है। यह दिन उन हाथों को सम्मान देने का अवसर है, जिन्होंने परिवारों को संभाला, बच्चों को बड़ा किया, रिश्तों को जोड़े रखा और अपने हिस्से की अनेक इच्छाओं को परिवार की जरूरतों के लिए पीछे कर दिया।
जिस उम्र में सहारे की जरूरत होती है, उस उम्र में अकेलापन क्यों?बुजुर्ग अक्सर अपने परिवार से बहुत कुछ नहीं मांगते। उन्हें महंगे सामान से ज्यादा दो पल की बातचीत, अपनेपन से भरा व्यवहार और यह भरोसा चाहिए कि परिवार में उनकी जगह आज भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। बदलती जीवनशैली, रोजगार की मजबूरियां और तेजी से बढ़ते परमाणु परिवारों के बीच कई वरिष्ठ नागरिकों के सामने अकेलेपन और उपेक्षा की चुनौती खड़ी हुई है। ऐसे में जरूरी है कि बुजुर्गों की जरूरतों को केवल आर्थिक सहायता के नजरिये से नहीं, बल्कि उनकी भावनात्मक और सामाजिक जरूरतों के साथ समझा जाए।
बुजुर्ग घर का हिस्सा नहीं, घर की नींव हैंजिस घर में बुजुर्ग होते हैं, वहां केवल एक उम्रदराज व्यक्ति नहीं होता, बल्कि परिवार का अनुभव, परंपरा और स्मृतियां मौजूद होती हैं। बच्चों के लिए दादा-दादी और नाना-नानी केवल रिश्ते नहीं, बल्कि जीवन की पहली पाठशाला भी होते हैं। उनके अनुभवों में संघर्ष की कहानी होती है और उनकी सलाह में कई ऐसी सीख छिपी होती है, जो किताबों से नहीं मिलती।
इसलिए वरिष्ठ नागरिकों को परिवार पर बोझ समझने की मानसिकता बदलना समाज की पहली जिम्मेदारी है।पेंशन और इलाज जरूरी, लेकिन सम्मान उससे भी ज्यादा जरूरी वरिष्ठ नागरिकों के लिए स्वास्थ्य सुविधाएं, पेंशन और सामाजिक सुरक्षा योजनाएं महत्वपूर्ण हैं, लेकिन बुजुर्गों के जीवन की जरूरत केवल इतनी नहीं है। उन्हें सम्मानजनक व्यवहार, सुरक्षित वातावरण, निर्णयों में भागीदारी और अपनी पसंद के अनुसार जीवन जीने का अधिकार भी चाहिए। बीमारी में डॉक्टर जरूरी है, आर्थिक कठिनाई में सहायता जरूरी है, लेकिन रोजमर्रा के जीवन में अपनेपन का एहसास भी उतना ही जरूरी है।
कानून अधिकार देता है, संस्कार सम्मान देना सिखाते हैंवरिष्ठ नागरिकों के संरक्षण के लिए माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 महत्वपूर्ण कानूनी आधार है। लेकिन हर समस्या का समाधान अदालत या कानून से नहीं हो सकता। बुजुर्गों के प्रति सम्मान की शुरुआत घर से होती है। उनके साथ बैठकर बात करना, उनकी बात ध्यान से सुनना, स्वास्थ्य का ख्याल रखना और महत्वपूर्ण पारिवारिक निर्णयों में उनकी राय लेना ऐसे छोटे कदम हैं, जो उनके जीवन में बड़ा बदलाव ला सकते हैं।
उम्र के साथ अनुभव बढ़ता है, अधिकार कम नहीं होतेकई बार उम्र बढ़ने के साथ बुजुर्गों को लगता है कि परिवार के फैसलों में उनकी भूमिका धीरे-धीरे खत्म हो रही है। यह स्थिति बदलने की जरूरत है। यदि कोई वरिष्ठ नागरिक स्वस्थ और सक्षम है तथा काम करना, सामाजिक गतिविधियों में हिस्सा लेना या नई चीजें सीखना चाहता है, तो उसे अवसर मिलना चाहिए। समाज को उम्र को कमजोरी का पर्याय मानने के बजाय अनुभव और क्षमता के रूप में देखना होगा।
बच्चों को भी चाहिए बुजुर्गों का साथ, बुजुर्गों को भी चाहिए बच्चों का समयआज के डिजिटल दौर में परिवार एक ही घर में रहकर भी एक-दूसरे से दूर होते जा रहे हैं। मोबाइल और व्यस्त दिनचर्या के बीच बुजुर्गों के साथ बैठकर बातचीत का समय कम होता जा रहा है। ऐसे में परिवार के युवा यदि प्रतिदिन कुछ समय अपने बुजुर्गों के साथ बिताएं, उनकी पुरानी बातें सुनें और उनकी जरूरतों को समझें तो यह केवल बुजुर्गों के लिए नहीं, बल्कि अगली पीढ़ी के लिए भी भावनात्मक और सामाजिक रूप से महत्वपूर्ण होगा।
आज उनके लिए सोचिए, कल आपकी उम्र भी यही होगी वृद्धजन दिवस का सबसे बड़ा संदेश शायद यही है कि बुजुर्गों की जिंदगी को दूर से देखने के बजाय उसमें अपना भविष्य देखना चाहिए। आज जो बेटा अपने पिता के साथ खड़ा है, कल उसके बच्चे उसके व्यवहार से सीखेंगे। आज जो परिवार अपनी मां की बात ध्यान से सुनता है, वही आने वाली पीढ़ी को सम्मान की असली परिभाषा सिखाता है। बुजुर्गों के साथ हमारा व्यवहार दरअसल आने वाले समय में हमारे अपने बुढ़ापे की तस्वीर भी तैयार करता है।
उन्हें जिंदगी के किनारे नहीं, परिवार के बीच चाहिए जगह अंतर्राष्ट्रीय वृद्धजन दिवस केवल शुभकामनाएं देने या कार्यक्रम आयोजित करने का अवसर नहीं है। यह स्वयं से सवाल करने का दिन है कि क्या हमारे घर के बुजुर्ग वास्तव में खुश हैं? क्या उनकी बात सुनी जाती है? क्या उन्हें अपने फैसले लेने की आजादी है? क्या बीमारी में कोई उनके साथ खड़ा होता है? क्या उन्हें यह महसूस कराया जाता है कि वे आज भी परिवार के लिए उतने ही जरूरी हैं?
दीर्घायु मानव जीवन की बड़ी उपलब्धि है, लेकिन लंबी जिंदगी की असली खूबसूरती तभी है, जब उसमें सम्मान हो, अपनापन हो, सुरक्षा हो और अपने फैसलों के साथ जीने की आजादी हो। बुजुर्गों को केवल उम्र का आंकड़ा समझने के बजाय उनके संघर्ष, त्याग और अनुभव को पहचानना होगा।
क्योंकि जिन कंधों ने कभी परिवार की जिम्मेदारियां उठाई थीं, उन्हें बुढ़ापे में अकेला छोड़ देना किसी भी संवेदनशील समाज की पहचान नहीं हो सकती।इस वृद्धजन दिवस पर जरूरत सिर्फ उन्हें शुभकामना देने की नहीं, बल्कि इतना कहने की है—आप हमारे लिए जरूरी हैं, आपकी बात आज भी मायने रखती है और इस घर में आपकी जगह कोई नहीं ले सकता!
