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डरना नहीं, बोलना है… हापुड़ के स्कूल में बच्चों को समझाए गए सुरक्षा और अधिकार के कानूनी पाठ

हापुड़। बचपन की सुरक्षा सिर्फ चार दीवारों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सही समय पर उठी एक आवाज भी बच्चे को बड़े खतरे से बचा सकती है। इसी सोच के साथ हापुड़ में बच्चों को डर के बजाय जागरूकता और चुप्पी के बजाय आवाज उठाने का संदेश दिया जा रहा है। POCSO अधिनियम-2012 के तहत चलाए जा रहे विशेष जागरूकता अभियान में विद्यार्थियों को उनके कानूनी अधिकार, सुरक्षित-असुरक्षित स्पर्श की पहचान और किसी भी अनुचित व्यवहार की स्थिति में मदद लेने के तरीकों की जानकारी दी जा रही है।

बच्चों की सुरक्षा को लेकर स्कूल में पहुंची कानून की जागरूकता जनपद न्यायाधीश एवं अध्यक्ष, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण अजय कुमार सिंह प्रथम के निर्देशन में चल रहे अभियान के तहत न्यायिक अधिकारियों द्वारा विद्यालयों में विधिक जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इसी क्रम में 30 सितंबर 2026 को न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वितीय साधना सिंह ने कम्पोजिट विद्यालय सबली, हापुड़ में कार्यक्रम आयोजित कर छात्र-छात्राओं को POCSO अधिनियम के महत्वपूर्ण प्रावधानों से अवगत कराया।

18 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए कानून में विशेष संरक्षणकार्यक्रम में बच्चों को सरल भाषा में समझाया गया कि 18 वर्ष से कम आयु का प्रत्येक व्यक्ति POCSO अधिनियम के तहत बच्चा माना जाता है। विद्यार्थियों को सुरक्षित और असुरक्षित स्पर्श के बीच अंतर समझाते हुए बताया गया कि यदि किसी व्यक्ति का व्यवहार उन्हें असहज, असुरक्षित या अनुचित महसूस कराता है तो उसे छिपाने के बजाय तुरंत किसी विश्वसनीय व्यक्ति तक बात पहुंचानी चाहिए।

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गलत व्यवहार पर चुप्पी नहीं, तुरंत उठानी होगी आवाज बच्चों को समझाया गया कि किसी भी अनुचित व्यवहार को सहन करना या डर के कारण छिपाना समाधान नहीं है। माता-पिता, शिक्षक या किसी विश्वसनीय व्यक्ति से समय रहते बात करने से आवश्यक सहायता प्राप्त की जा सकती है। विद्यार्थियों को उनके अधिकारों और सुरक्षा से जुड़े कानूनी प्रावधानों की भी जानकारी दी गई।ऑनलाइन दुनिया में भी बच्चों को सतर्क रहने का संदेश जागरूकता कार्यक्रम में सुरक्षा की तस्वीर को केवल स्कूल और आसपास के वातावरण तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि ऑनलाइन दुनिया के खतरों पर भी चर्चा की गई।

विद्यार्थियों को सोशल मीडिया के सुरक्षित इस्तेमाल, निजी जानकारी साझा करने में सावधानी, साइबर उत्पीड़न तथा ऑनलाइन अनुचित व्यवहार की स्थिति में शिकायत करने के तरीकों के बारे में जानकारी दी गई।बाल विवाह को लेकर भी विद्यार्थियों को किया जागरूक कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों को बाल विवाह से जुड़े कानूनी प्रावधानों के बारे में भी बताया गया। अधिकारियों ने समझाया कि बच्चों को अपने अधिकारों की जानकारी होना जरूरी है, ताकि किसी अनुचित या गैर कानूनी स्थिति में वे सही समय पर किसी भरोसेमंद व्यक्ति से सहायता ले सकें।

धमकी या दबाव मिले तो डरकर रहने की जरूरत नहींन्यायिक मजिस्ट्रेट साधना सिंह ने विद्यार्थियों को समझाया कि यदि उनके साथ किसी भी प्रकार की असहज स्थिति, दबाव, धमकी या अनुचित व्यवहार होता है तो वे चुप न रहें। माता-पिता, शिक्षक अथवा किसी अन्य विश्वसनीय व्यक्ति को तत्काल जानकारी देने के लिए विद्यार्थियों को प्रेरित किया गया।पीड़ित बच्चे की पहचान गोपनीय रखने का प्रावधान कार्यक्रम में विद्यार्थियों को यह भी बताया गया कि POCSO से जुड़े मामलों में पीड़ित बच्चे की पहचान की गोपनीयता को लेकर कानून में विशेष प्रावधान हैं।

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बच्चों को समझाया गया कि किसी घटना की स्थिति में घबराने या स्वयं को दोषी मानने के बजाय उचित व्यक्ति और संबंधित व्यवस्था से सहायता लेना जरूरी है।जागरूकता का उद्देश्य बच्चों में डर नहीं, भरोसा पैदा करना अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि जागरूकता अभियान का उद्देश्य बच्चों में भय पैदा करना नहीं, बल्कि उन्हें अपने अधिकारों और उपलब्ध सुरक्षा व्यवस्था के प्रति सजग बनाना है। बच्चों को यह संदेश दिया गया कि किसी भी परेशानी की स्थिति में मदद मांगना कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी सुरक्षा की दिशा में जरूरी कदम है।एक अक्टूबर तक चलेगा अभियान का प्रथम चरणजिला विधिक सेवा प्राधिकरण के पीएलवी गौरव सहगल, साक्षी, निशा और अनुज ने बताया कि अभियान का प्रथम चरण 1 अक्टूबर 2026 तक संचालित किया जा रहा है।

अभियान के माध्यम से विद्यालयों में बच्चों को POCSO कानून की जानकारी देने के साथ सुरक्षित, संवेदनशील और सहयोगपूर्ण वातावरण तैयार करने पर जोर दिया जा रहा है।बच्चों की सुरक्षा में समाज की भी बड़ी जिम्मेदारी अधिकारियों ने कहा कि बच्चों की सुरक्षा केवल पुलिस, न्याय व्यवस्था या किसी एक विभाग की जिम्मेदारी नहीं है। परिवार, विद्यालय, समाज और प्रत्येक जिम्मेदार नागरिक की भूमिका इसमें महत्वपूर्ण है। बच्चों को कानून की जानकारी देना उन्हें उनके अधिकारों से परिचित कराने के साथ ऐसी परिस्थितियों में सही कदम उठाने के लिए तैयार करना भी है, जहां उनकी सुरक्षा और गरिमा प्रभावित हो सकती है।