राष्ट्र संवाद टाइम्स हापुड़
सरकारी स्कूल का वीडियो बना सियासी बारूद, FIR से लेकर वीडियोग्राफी बैन तक सवालों के घेरे में शिक्षा विभाग
हापुड़। सरकारी विद्यालयों की व्यवस्थाओं को लेकर सामने आए एक वीडियो ने अब महज एक स्कूल की बदहाली के सवाल को बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक विवाद बना दिया है। वीडियो के बाद आम आदमी पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता सीएम चौहान के खिलाफ गाजियाबाद के भोजपुर थाने में एफआईआर दर्ज होने की बात सामने आई, तो विपक्ष ने इसे सरकारी स्कूलों की हकीकत सामने लाने वालों पर कार्रवाई करार देते हुए सरकार और शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर तीखे सवाल दाग दिए।
मामले की तपिश इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि इसी बीच प्रदेश के कई जिलों में सरकारी स्कूलों में बाहरी लोगों और YouTubers की बिना अनुमति एंट्री, फोटो और वीडियोग्राफी पर रोक के निर्देश सामने आए हैं। हापुड़ में जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी दीपा भाटी ने परिषदीय विद्यालयों में बिना सक्षम अधिकारी की अनुमति बाहरी व्यक्तियों, YouTubers और सोशल मीडिया से जुड़े लोगों के प्रवेश पर रोक लगाई है। विद्यालय परिसर में फोटो-वीडियो बनाने के लिए भी अनुमति अनिवार्य की गई है। स्कूलों के गेट बंद रखने और अनधिकृत गतिविधियों पर नजर रखने के निर्देश भी दिए गए हैं। (ABP News)
यही फैसला अब बहस का सबसे बड़ा केंद्र बनता दिखाई दे रहा है—क्या सरकारी स्कूलों की सुरक्षा और बच्चों की निजता के नाम पर वीडियोग्राफी रोकना जरूरी है, या फिर इसी बहाने स्कूलों की जमीनी हकीकत कैमरे से दूर हो जाएगी? सवाल इसलिए भी गंभीर है क्योंकि वीडियो सामने आने के बाद जिस मुद्दे पर बहस शुरू हुई थी, वह अब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सरकारी संस्थानों में पारदर्शिता तक पहुंच चुका है।
दिलचस्प बात यह है कि 23 अगस्त को उत्तर प्रदेश और राजस्थान के सरकारी स्कूलों में बाहरी लोगों के प्रवेश तथा फोटो-वीडियोग्राफी पर लगाए गए प्रतिबंधों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दिए जाने की खबर भी सामने आई। याचिका में इन प्रतिबंधों को अभिव्यक्ति और प्रेस की स्वतंत्रता समेत संवैधानिक अधिकारों के संदर्भ में चुनौती दी गई है। (AajTak)
इधर राजनीतिक मोर्चे पर आप सांसद संजय सिंह ने भी सोशल मीडिया के माध्यम से सरकार को घेरा। उनका सवाल है कि यदि सरकारी विद्यालयों में कमियां हैं तो उन्हें दूर करने की कार्रवाई होनी चाहिए, न कि कमियां सामने लाने वाले वीडियो को लेकर कार्रवाई का रास्ता अपनाया जाए। दूसरी तरफ प्रशासनिक और विभागीय पक्ष का तर्क है कि बिना अनुमति स्कूल परिसर में प्रवेश, बच्चों की फोटो-वीडियोग्राफी और सोशल मीडिया पर सामग्री प्रसारित करने से पढ़ाई, विद्यार्थियों की सुरक्षा तथा विद्यालय एवं शिक्षक की गरिमा प्रभावित हो सकती है। (ABP News)
विवाद का मूल प्रश्न अब और बड़ा हो चुका है। अगर सरकारी स्कूल व्यवस्था की निगरानी के लिए विभागीय अधिकारी पहले से जिम्मेदार हैं, तो सोशल मीडिया पर सामने आने वाले वीडियो आखिर किस सीमा तक जनहित का माध्यम हैं और किस बिंदु पर वे नियमों का उल्लंघन बन जाते हैं? यही वह सवाल है, जिस पर सरकार, शिक्षा विभाग और राजनीतिक दल आमने-सामने खड़े नजर आ रहे हैं।
सीएम चौहान का पक्ष है कि वीडियो का उद्देश्य किसी शिक्षक या कर्मचारी की छवि खराब करना नहीं, बल्कि विद्यालय की कथित वास्तविक स्थिति को सार्वजनिक करना था। वहीं एफआईआर और वीडियोग्राफी संबंधी प्रतिबंधों ने इस पूरे घटनाक्रम को और विस्फोटक बना दिया है।
अब निगाहें पुलिस जांच, शिक्षा विभाग के आधिकारिक स्पष्टीकरण और न्यायिक स्तर पर होने वाली सुनवाई पर टिकी हैं। फिलहाल एक सरकारी स्कूल का वीडियो सिर्फ स्कूल की दीवारों तक सीमित मामला नहीं रहा—यह सरकारी शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता, जवाबदेही, डिजिटल पत्रकारिता और प्रशासनिक अधिकारों के बीच टकराव का बड़ा मुद्दा बन चुका है।
