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अनागारिक धर्मपाल की जयंती पर गूंजा बुद्ध वंदना का स्वर, पुष्प अर्पित कर किया नमन

हापुड़। जनपद हापुड़ के पिलखुवा के मोहल्ला आर्यनगर स्थित डॉ. अंबेडकर भवन में बुधवार को बोधिसत्व अनागारिक धर्मपाल की 162वीं जयंती श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाई गई। त्रिरत्न बौद्ध महासंघ उपकेंद्र पिलखुवा एवं माता रमाबाई अंबेडकर महिला संघ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रम में बड़ी संख्या में महिलाओं ने सहभागिता की।

कार्यक्रम में भगवान बुद्ध, बोधिसत्व अनागारिक धर्मपाल एवं डॉ. भीमराव आंबेडकर के चित्रों पर पुष्प अर्पित कर नमन किया गया।कार्यक्रम का शुभारंभ त्रिशरण, पंचशील, सकारात्मक शील ग्रहण एवं बुद्ध वंदना के साथ हुआ। इस दौरान धम्मचारिणी प्रज्ञाकीर्ति ने बोधिसत्व अनागारिक धर्मपाल के जीवन, संघर्ष और बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में उनके योगदान पर विस्तार से प्रकाश डाला।उन्होंने बताया कि 17 सितंबर 1864 को जन्मे अनागारिक धर्मपाल ने युवावस्था में गृह त्याग कर अपना जीवन बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित कर दिया था।

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उन्होंने भारत के साथ अमेरिका, यूरोप, जर्मनी और श्रीलंका में बौद्ध धर्म के विकास के लिए महत्वपूर्ण कार्य किए तथा बौद्ध विहारों, विद्यालयों और प्रशिक्षण केंद्रों के निर्माण में योगदान दिया।धम्मचारिणी प्रज्ञाकीर्ति ने बताया कि वर्ष 1891 में बोधगया स्थित महाबोधि महाविहार की दुर्दशा देखकर अनागारिक धर्मपाल व्यथित हुए और उसके संरक्षण एवं मुक्ति के लिए आंदोलन शुरू किया।

उन्होंने महाबोधि सोसायटी की स्थापना की और महाबोधि पत्रिका का प्रकाशन भी कराया। वर्ष 1893 में शिकागो, अमेरिका में आयोजित विश्व धर्म संसद में भारत के बौद्धों का प्रतिनिधित्व करते हुए उन्होंने महाबोधि महाविहार के मुद्दे को प्रभावी ढंग से उठाया, जिससे बोधगया की ओर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित हुआ।उन्होंने बताया कि अनागारिक धर्मपाल के अथक प्रयासों से महाबोधि महाविहार के पुनर्निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य हुए।

इसके प्रबंधन के लिए संयुक्त कमेटी का गठन किया गया, जिसके अध्यक्ष गया के जिलाधिकारी होते हैं।कार्यक्रम में अंजू, मुनेश निमेष, बीना सागर, कांता निमेष, शकुंतला, किशनबिरी, बिरमा देवी, सुमन, राजेंद्री, जगवती, कृष्णा निमेष, रानी, ललिता, कश्मीरी देवी और कविता सहित बड़ी संख्या में महिलाएं उपस्थित रहीं। कार्यक्रम के दौरान अनागारिक धर्मपाल के जीवन और उनके योगदान को याद करते हुए उनके विचारों को जन-जन तक पहुंचाने का संकल्प लिया गया।

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