राष्ट्र संवाद टाइम्स हापुड़ : ajay verma

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जनपद हापुड़ के पिलखुवा हैंडलूम उद्योग की चिंता लगातार बढ़ती जा रही है। देश में बढ़ती धागे की कीमतों और कच्चे माल की लागत बढ़ने से उत्पादन का घाटा लगातार बढ़ता जा रहा है। स्थिति यह है कि पुराने ऑर्डरों की आपूर्ति करना भी कारोबारियों के लिए मुश्किल होता जा रहा है। जिस दर पर ऑर्डर लिए गए थे, उससे अधिक लागत में कपड़ा तैयार होने के कारण कारोबारियों को मुनाफे के बजाय नुकसान उठाना पड़ रहा है। पिलखुवा का कपड़ा उद्योग लंबे समय से देश के प्रमुख कपड़ा बाजारों में अपनी पहचान बनाए हुए है। यहां तैयार होने वाला कपड़ा दिल्ली समेत कई राज्यों के बाजारों तक पहुंचता है। लेकिन धागे की लगातार बढ़ती कीमतों ने कारोबारियों के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। धागा महंगा होने के साथ उत्पादन लागत बढ़ रही है, जबकि बाजार में तैयार माल की कीमत उसी अनुपात में बढ़ाना संभव नहीं हो पा रहा है। इससे कारोबारियों के मुनाफे पर सीधा असर पड़ रहा है।बैग कारोबारी अशोक कुमार ने बताया कि धागे के दाम बढ़ने से पुराने ऑर्डरों को पूरा करना मुश्किल हो गया है। ऑर्डर जिस कीमत पर लिया गया था, मौजूदा समय में उसी कीमत पर माल तैयार करने की लागत अधिक पड़ रही है। ऐसे में कारोबारियों को नुकसान उठाकर ऑर्डर पूरा करना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि यदि धागे की कीमतों में जल्द स्थिरता नहीं आई तो उद्योग पर इसका और गंभीर असर पड़ सकता है।वहीं चादर कारोबारी संजीव कुमार ने बताया कि धागे की कीमत बढ़ने का सीधा असर चादर के उत्पादन पर पड़ रहा है। कच्चे माल की लागत लगातार बढ़ रही है, लेकिन बाजार में तैयार माल के दाम बढ़ाना आसान नहीं है। इसका सबसे अधिक दबाव छोटे और मध्यम कारोबारियों पर पड़ रहा है। कारोबारियों के अनुसार पुराने ऑर्डर सबसे बड़ी परेशानी बने हुए हैं। कई ऑर्डर कम कीमत पर लिए गए थे, लेकिन अब महंगे धागे से उनका उत्पादन करने पर लागत तय कीमत से ऊपर पहुंच रही है। वहीं धागे के दाम में लगातार उतार-चढ़ाव के कारण कारोबारी नए ऑर्डर लेने में भी सावधानी बरत रहे हैं। उन्हें आशंका है कि ऑर्डर लेने के बाद कीमत बढ़ने पर नुकसान और बढ़ सकता है।कारोबारियों ने सरकार से धागे की कीमतों में स्थिरता लाने और बढ़ती उत्पादन लागत को देखते हुए उद्योग को राहत देने के लिए प्रभावी कदम उठाने की मांग की है। उनका कहना है कि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो पिलखुवा के पावरलूम उद्योग की मुश्किलें और बढ़ सकती हैं।

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